ऑटिज़्म — बच्चे के अपनी दुनिया से जुड़ने का अलग तरीक़ा
ਇਹ ਲੇਖ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਪੜ੍ਹੋ →ऑटिज़्म (Autism) क्या है?
ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर दिमाग़ के विकास से जुड़ी एक स्थिति है, जो बच्चे के बात-चीत करने, लोगों से जुड़ने और आस-पास की दुनिया को समझने के तरीक़े को अलग बनाती है। “स्पेक्ट्रम” शब्द इसलिए है क्योंकि हर बच्चे में यह अलग-अलग रूप और तीव्रता में दिखता है — कोई बहुत हल्के लक्षणों के साथ सामान्य स्कूल में पढ़ता है, किसी को ज़्यादा सहारे की ज़रूरत होती है। यह माता-पिता की परवरिश की ग़लती से नहीं होता।
शुरुआती संकेत (2-3 साल की उम्र में)
- नाम पुकारने पर लगातार जवाब न देना
- आँख से आँख मिलाने से बचना
- बोलने में देरी, या बोलने के बाद कुछ शब्द फिर से खो देना
- इशारा करना या दिखाना (जैसे किसी चीज़ की ओर उँगली से इशारा) कम या न होना
- एक ही हरकत को बार-बार दोहराना (हाथ हिलाना, घूमना)
- खेल-खिलौनों में बदलाव या रूटीन बदलने पर बहुत परेशान हो जाना
“बड़ा होकर ठीक हो जाएगा” सोचकर इंतज़ार न करें
बहुत से परिवार शुरुआती संकेतों को “देर से बोलने वाला बच्चा है, अपने-आप ठीक हो जाएगा” समझकर टाल देते हैं। जितनी जल्दी सही जाँच और थेरेपी शुरू होती है, बच्चे के बोलने, सीखने और लोगों से जुड़ने की क्षमता उतनी ही बेहतर विकसित होती है। यह किसी की ग़लती नहीं है, पर देरी बच्चे का नुक़सान कर सकती है।
इलाज और सहारा
ऑटिज़्म का कोई एक “इलाज़” नहीं, बल्कि सही थेरेपी (स्पीच थेरेपी, बिहेवियर थेरेपी, ऑक्युपेशनल थेरेपी) से बच्चा बोलना, दूसरों से जुड़ना और रोज़मर्रा के काम सीखता है। हर बच्चे की ज़रूरत अलग होती है — SSK में सही जाँच के बाद बच्चे के हिसाब से योजना बनाई जाती है।
परिवार क्या करे?
- बच्चे की तुलना “सामान्य” भाई-बहन से न करें
- बच्चे के अपने तरीक़े से जुड़ने की कोशिश को सराहें, ज़बरदस्ती “सामान्य” बनाने की कोशिश न करें
- रोज़ की रूटीन जितनी स्थिर रखें, बच्चे को उतना आराम मिलता है
- थेरेपिस्ट की सलाह लगातार, धैर्य से अपनाएँ — असर धीरे-धीरे दिखता है
डॉ. शर्मा का वीडियो

जितनी जल्दी शुरुआत, उतना बेहतर भविष्य।
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